राज्य में कुत्ते के काटने के बढ़ते आंकड़े और नई पहल झारखंड के विभिन्न जिलों से लगातार सामने आ रही आवारा कुत्तों के काटने की घटनाओं ने स्वास्थ्य प्रशासन की चिंता को काफी बढ़ा दिया है, जिसके चलते एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए जागरूकता अभियान की रूपरेखा तैयार की गई है। आने वाले आगामी बाईस सितंबर से लेकर अट्ठारह सितंबर की समयावधि के दौरान पूरे राज्यभर में विभिन्न स्तरों पर इस जानलेवा बीमारी के प्रति आम जनता को शिक्षित करने का काम बड़े पैमाने पर किया जाएगा। इस दौरान शहरी बस्तियों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक नुक्कड़ नाटक, स्वास्थ्य शिविर और पंपलेट वितरण के माध्यम से लोगों को यह समझाया जाएगा कि जानवर के काटने पर तुरंत कौन से चिकित्सीय कदम उठाने चाहिए और किस प्रकार की लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। स्थानीय अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को भी इस अवधि के दौरान विशेष रूप से सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं ताकि किसी भी पीड़ित को रेबीज रोधी टीके की कमी का सामना न करना पड़े और समय पर समुचित उपचार मिल सके।
रेबीज संक्रमण का खतरा और सामुदायिक स्वास्थ्य की चुनौतियां रेबीज एक अत्यंत गंभीर और शत-प्रतिशत घातक विषाणु जनित संक्रमण है जो मुख्य रूप से संक्रमित कुत्तों, बिल्लियों या अन्य मवेशियों के काटने या खरोंचने से इंसानों में फैलता है। झारखंड जैसे राज्यों में जहाँ शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है और आवारा पशुओं की संख्या पर नियंत्रण पाना स्थानीय निकायों के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, वहाँ इस तरह के स्वास्थ्य संकट आम बात होते जा रहे हैं। समय पर एंटी-रेबीज वैक्सीन न लगवाने की स्थिति में यह बीमारी मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को पूरी तरह से प्रभावित कर देती है और इसके लक्षण प्रकट होने के बाद जीवित बचने की संभावना लगभग शून्य हो जाती है। यही कारण है कि चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा हमेशा से यह सलाह दी जाती रही है कि किसी भी जानवर के काटने पर घाव को तुरंत बहते पानी और साबुन से अच्छी तरह साफ करके बिना किसी देरी के नजदीकी अस्पताल का रुख करना चाहिए। जागरूकता की कमी और अंधविश्वास के चलते कई लोग आज भी समय पर इलाज कराने के बजाय झाड़-फूंक के चक्कर में पड़ जाते हैं, जिससे उनकी जान खतरे में पड़ जाती है।
अभियान का आगामी असर और प्रशासन की भावी रणनीतियां इस बहुप्रतीक्षित जागरूकता सप्ताह के आयोजन से राज्य के स्वास्थ्य महकमे को उम्मीद है कि आम जनता के बीच फैली भ्रांतियां दूर होंगी और लोग समय रहते अस्पतालों तक पहुँचकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। जिला प्रशासन और स्थानीय नगर निकायों को भी इस अभियान के दौरान अपने-अपने क्षेत्रों में आवारा कुत्तों के टीकाकरण और उनकी नसबंदी के कार्यक्रमों को तेज करने के लिए निर्देशित किया गया है ताकि संक्रमण के मूल स्रोत को ही नियंत्रित किया जा सके। स्कूलों और कॉलेजों में विशेष सत्र आयोजित करके छात्र-छात्राओं को जानवरों के साथ सुरक्षित दूरी बनाए रखने और किसी भी अप्रिय घटना की स्थिति में तुरंत अभिभावकों को सूचित करने के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा। यदि यह अभियान अपनी तय योजनाओं के अनुसार सफलतापूर्वक धरातल पर उतरता है, तो आने वाले महीनों में झारखंड के भीतर कुत्ते के काटने के मामलों के साथ-साथ रेबीज से होने वाली मौतों के आंकड़ों में भी उल्लेखनीय कमी देखने को मिल सकती है।