राजधानी में बंदरों के जानलेवा हमले
शिमला शहर में पिछले महीने बंदरों के एक भीषण हमले में एक महिला की दर्दनाक मौत हो गई। यह घटना कोई इकलौती नहीं है, बल्कि इससे पहले भी साल 2014 में मिडिल बाजार, 2020 में कुफ्टाधार और 2023 में ढांडा क्षेत्र में बंदरों के हमलों से एक-एक युवती की जान जा चुकी है। इन घटनाओं ने स्थानीय निवासियों में भारी दहशत फैला दी है। शिमला की सड़कों, घरों की छतों और सार्वजनिक स्थलों पर बंदरों का जमावड़ा आम बात हो गई है। रिज मैदान, मालरोड और जाखू जैसे प्रमुख पर्यटक स्थलों पर भी बंदरों की मौजूदगी से पर्यटकों को लगातार परेशानी का सामना करना पड़ता है। मानव और बंदरों के बीच लगातार बढ़ते इस शारीरिक संपर्क के कारण काटने और घायल करने जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। सरकारी स्तर पर इसे नियंत्रित करने के प्रयास अभी तक काफी सीमित रहे हैं।
वित्तीय संकट और सरकारी नसबंदी अभियान
हिमाचल वन विभाग द्वारा संचालित बंदरों की नसबंदी का अभियान वर्ष 2006 में शुरू किया गया था। मार्च 2024 तक प्रदेश के विभिन्न केंद्रों जैसे टूटू-कंडी, हमीरपुर, कांगड़ा, ऊना, सिरमौर, चंबा और मंडी में कुल 1,86,448 बंदरों की नसबंदी की गई। हालांकि, वर्ष 2022 से बंदरों के नियंत्रण के लिए मिलने वाली केंद्रीय ग्रांट बंद हो गई है। एक बंदर की नसबंदी पर लगभग 1,500 रुपये से अधिक का खर्च आता है, जिसे वर्तमान में विभाग के लिए वहन करना कठिन हो रहा है। वित्तीय सहायता रुकने के कारण अब बंदरों को पकड़ने और मानव-बंदर संघर्ष को कम करने वाली गतिविधियां काफी धीमी पड़ गई हैं। वन विभाग ने इस समस्या को सुलझाने के लिए राज्य सरकार के पास फंड उपलब्ध करवाने का प्रस्ताव भेजा है ताकि अभियान की गति बनी रहे।
आंकड़ों और वास्तविकता के बीच का अंतर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2004 में प्रदेश में 3,17,512 बंदर थे, जो 2019-20 के आकलन तक घटकर 1,36,443 रह गए। यह कमी लगभग 57 फीसदी है, लेकिन धरातल पर स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है। वर्ष 2017 में केंद्र सरकार ने हिमाचल के कुछ चिन्हित क्षेत्रों में बंदरों को एक साल के लिए वर्मिन यानी उपद्रवी जीव घोषित किया था ताकि स्थानीय प्रशासन को उन्हें नियंत्रित करने की अनुमति मिल सके। इसके बावजूद, किसानों को मक्की और फल जैसी फसलों के नुकसान से राहत नहीं मिली। सिरमौर के रमेश वर्मा जैसे किसानों का मानना है कि अनुमति मिलने के दौरान कुछ राहत जरूर मिली थी, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं था। अब भविष्य में बंदरों की संख्या बढ़ने की आशंका ने प्रशासन और स्थानीय निवासियों के सामने नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।