मांदर को मिला आधिकारिक भौगोलिक संकेत
झारखंड के पारंपरिक और प्रसिद्ध लोक वाद्य यंत्र मांदर को आधिकारिक रूप से भौगोलिक संकेत का दर्जा मिल गया है। इस विशिष्ट मान्यता के मिलने से इस सांस्कृतिक और पारंपरिक वाद्य यंत्र की पहचान अब पूरी दुनिया में आधिकारिक तौर पर दर्ज हो गई है। मांदर झारखंड की लोक संस्कृति, नृत्य और संगीत का एक बेहद अहम और अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। इस वाद्य यंत्र के बिना राज्य के आदिवासी और पारंपरिक उत्सवों की कल्पना करना भी अधूरा सा लगता है। जीआई टैग मिलने की यह बड़ी खबर सामने आने के बाद से ही राज्य भर के कलाकारों, संगीत प्रेमियों और संस्कृति संरक्षकों में बेहद उत्साह का माहौल बना हुआ है। स्थानीय स्तर पर लोग इस बड़ी उपलब्धि को अपनी सांस्कृतिक विरासत की एक बड़ी जीत के रूप में देख रहे हैं। इस मान्यता के मिलने से अब इस पारंपरिक वाद्य यंत्र के नाम पर किसी अन्य क्षेत्र द्वारा दावा नहीं किया जा सकेगा और इसकी मूल पहचान पूरी तरह से सुरक्षित रहेगी। यह एक ऐसा ऐतिहासिक क्षण है जो झारखंड की समृद्ध लोक कला को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर एक नई और मजबूत स्थिति प्रदान करने का काम करेगा।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर प्रक्रिया
मांदर को यह प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेत मिलने की पूरी प्रक्रिया में कई पुराने और ऐतिहासिक दस्तावेजों को मुख्य आधार बनाया गया है। मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार इस वाद्य यंत्र के लिए वर्ष 1915 से लेकर वर्ष 1940 तक के समय के ऐतिहासिक दस्तावेजों को जुटाया गया था। इन तमाम पुराने दस्तावेजों और साक्ष्यों को प्रामाणिक मानकर ही इस वाद्य यंत्र की प्राचीनता और उसकी सांस्कृतिक महत्ता को पूरी तरह से सिद्ध किया गया है। कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत इस वाद्य यंत्र के उद्गम, इसके पारंपरिक स्वरूप और इसके ऐतिहासिक इस्तेमाल से जुड़े सभी पुख्ता सबूत संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखे गए थे। दस्तावेजों की इस लंबी और गहन जांच-पड़ताल के बाद ही इस पारंपरिक वस्तु को जीआई टैग प्रदान करने का अंतिम निर्णय लिया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में शामिल विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने इसके ऐतिहासिक साक्ष्यों को सहेजने में काफी लंबी मेहनत की थी। पुराने अभिलेखों में दर्ज जानकारियों ने यह साबित कर दिया कि यह वाद्य यंत्र झारखंड की माटी और उसकी संस्कृति से कितने गहरे तरीके से जुड़ा हुआ है। इन दस्तावेजों के आधार पर ही यह स्पष्ट हो पाया कि मांदर का इतिहास कितना पुराना और कितना समृद्ध रहा है।
सांस्कृतिक पहचान और भविष्य का महत्व
किसी भी क्षेत्र की पारंपरिक वस्तु को जब भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग मिलता है तो इसके पीछे एक गहरी सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि काम करती है। यह विशेष टैग मिलने से न केवल उस वस्तु विशेष को कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है बल्कि उससे जुड़े पारंपरिक कारीगरों और कलाकारों को भी सीधा लाभ मिलता है। झारखंड के संदर्भ में बात करें तो मांदर केवल एक संगीत उपकरण नहीं है बल्कि यह यहां की सामाजिक समरसता और उत्सवधर्मिता का जीवंत प्रतीक भी है। इस पहचान के मिलने से भविष्य में इस वाद्य यंत्र को बनाने वाले स्थानीय दस्तकारों और शिल्पकारों के हुनर को एक नया बाजार और सम्मान दोनों मिल सकेंगे। इसके अलावा दुनिया भर के शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए भी यह वाद्य यंत्र और अधिक आकर्षण का केंद्र बनेगा। ऐतिहासिक दस्तावेजों के बल पर मिली इस सफलता से यह भी साबित हो गया है कि यदि अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को सहेज कर रखा जाए तो उन्हें दुनिया भर में उचित मुकाम मिल सकता है। आने वाले समय में इस वाद्य यंत्र के प्रचार-प्रसार और इसके संरक्षण के लिए सरकार और स्थानीय संगठनों द्वारा कई तरह के नए कदम उठाए जाने की पूरी संभावना है ताकि इसकी प्राचीन परंपरा यूं ही निरंतर आगे बढ़ती रहे।