जीआई टैग की दौड़ में छत्तीसगढ़ की स्थिति
भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग किसी क्षेत्र विशेष के उत्पादों को उनकी अनूठी पहचान दिलाने का एक राष्ट्रीय स्तर का कानूनी माध्यम होता है। छत्तीसगढ़ राज्य अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति हस्तशिल्प और अनूठे प्राकृतिक उत्पादों के लिए देश भर में विशेष पहचान रखता है। इसके बावजूद विभिन्न उत्पादों के लिए जीआई टैग हासिल करने के मामले में यह राज्य अन्य कई राज्यों की तुलना में काफी पिछड़ गया है। इस कमी को दूर करने के लिए हाल ही में स्थानीय स्तर पर कई चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। बस्तर विश्वविद्यालय ने इस दिशा में एक नई शुरुआत करते हुए मामलों को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि स्थानीय उत्पादों को कानूनी सुरक्षा और पहचान मिलना बहुत जरूरी है। इस पूरी प्रक्रिया के तहत राज्य के उन तमाम उत्पादों की सूची तैयार की जा रही है जो इस विशेष दर्जे के हकदार हैं। विश्वविद्यालय के इस प्रयास से आने वाले दिनों में स्थानीय कारीगरों और उत्पादकों को सीधा लाभ मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है।
बस्तर विश्वविद्यालय की ओर से नई पहल
बस्तर विश्वविद्यालय ने राज्य को इस दौड़ में आगे बढ़ाने के वास्ते एक ठोस और व्यावहारिक पहल की है। विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने इस संबंध में एक नई योजना पर काम करना शुरू कर दिया है ताकि प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कलाकृतियों और विशेष कृषि उत्पादों की पहचान करके उनका पूरा दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। इस कार्य में विशेषज्ञों की एक विशेष टीम को भी लगाया गया है जो हर एक उत्पाद के भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व का अध्ययन कर रही है। विश्वविद्यालय इस प्रक्रिया के माध्यम से कारीगरों को जागरूक करने का काम भी कर रहा है ताकि उन्हें अपने अधिकारों की पूरी जानकारी मिल सके। इस नई पहल के तहत विभिन्न विभागों के बीच आपसी तालमेल को भी बेहतर बनाया जा रहा है ताकि दस्तावेजों को समय पर तैयार किया जा सके। अधिकारियों का कहना है कि इस दिशा में उठाए जा रहे हर एक कदम से बस्तर क्षेत्र की अनूठी कला को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान मिलेगी। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
जीआई टैग का महत्व और भविष्य की रूपरेखा
किसी भी उत्पाद को भौगोलिक संकेत मिलने से उसकी नकल रोकी जा सकती है और बाजार में उसकी कीमत भी बेहतर मिलती है। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह टैग मिलना स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ पारंपरिक कारीगरों की आजीविका को भी सुरक्षित करेगा। बस्तर विश्वविद्यालय की यह नई पहल इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है जिससे अन्य शिक्षण संस्थान भी प्रेरणा ले सकते हैं। आने वाले समय में इस योजना के तहत राज्य के कई अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी इस सूची में शामिल किए जाने की पूरी संभावना है। स्थानीय लोगों और बुनकरों को इस प्रक्रिया से जोड़ने के लिए विश्वविद्यालय की तरफ से कई जागरूकता शिविर भी आयोजित किए जाने की योजना है। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उचित सम्मान दिलाना है। अधिकारियों के मुताबिक यदि यह प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ा तो राज्य में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।