Lucknow Desk : करोड़ों रुपये की लागत से तैयार बिरसिंहपुर का 100 शैय्या संयुक्त चिकित्सालय आज भी व्यवस्थाओं और संसाधनों को लेकर सवालों के घेरे में है। अब अस्पताल में होने वाले विभिन्न कार्यों और टेंडर प्रक्रिया को लेकर सामने आ रहे आरोपों ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि अस्पताल में विभिन्न कार्यों के ठेके और आपूर्ति के मामले में कुछ चुनिंदा फर्मों को कथित तौर पर बार-बार लाभ पहुंचाया जा रहा है। यहां तक आरोप लगाया जा रहा है कि एक ही परिवार से जुड़ी कई फर्मों के माध्यम से अलग-अलग कार्य कराए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि अभी नहीं हुई है इसलिए सवाल यह है कि यदि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो विभाग टेंडर से लेकर भुगतान तक का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में संकोच क्यों करे। मेहमान या अस्पताल का अनौपचारिक निरीक्षक सबसे गंभीर सवाल उस कथित बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी को लेकर उठ रहा है जिसके बारे में शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वह सुबह से शाम तक CMS कक्ष में बैठता है और अस्पताल में होने वाले कार्यों पर नजर रखता है। यदि आरोप गलत हैं तो विभाग को इसे स्पष्ट करना चाहिए। लेकिन यदि कोई बाहरी व्यक्ति नियमित रूप से प्रशासनिक कार्यालय में बैठकर अस्पताल के कामकाज और ठेकों से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप करता है तो यह अपने आप में जांच का विषय है। सीसीटीवी फुटेज इसकी सबसे निष्पक्ष गवाही दे सकता है।अस्पताल प्रशासन यदि पिछले कुछ महीनों की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, विजिटर रजिस्टर और संबंधित व्यक्ति की पहचान/अधिकृत भूमिका की जांच करा दे तो कई सवालों के जवाब स्वतः सामने आ सकते हैं।
अस्पताल में इलाज जरूरी है, ठेकेदारी व्यवस्था नहीं बिरसिंहपुर अस्पताल पहले ही चिकित्सकों और जांच सुविधाओं की कमी जैसे सवालों से जूझ चुका है। सार्वजनिक रिपोर्टों में यहां आवश्यक जांच सुविधाओं के अभाव और मरीजों को बाहर जांच कराने की मजबूरी का उल्लेख हो चुका है। ऐसे में यदि अस्पताल के संसाधनों और सरकारी धन का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से नहीं हो रहा है तो यह मरीजों के हित से सीधा जुड़ा मामला है। अब जांच की जरूरत है, सिर्फ निरीक्षण की नहीं जिलाधिकारी द्वारा हाल में अस्पताल का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं को बेहतर करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। अब जरूरत केवल निरीक्षण की नहीं बल्कि स्वतंत्र वित्तीय और प्रशासनिक जांच की है।वर्क आर्डर, बिल-वाउचर, भुगतान विवरण, फर्मों के दस्तावेज, विजिटर रजिस्टर और उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज की जांच कराई जाए। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच से शिकायतकर्ताओं का भ्रम दूर होगा। और यदि आरोपों में सच्चाई है तो सरकारी धन की कथित बंदरबांट का रास्ता भी सामने आएगा।