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चंबा समाचार: मिंजर मेले के बाद भी स्थानीय कलाकार खाली हाथ

चंबा में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध मिंजर मेले के संपन्न होने के बाद स्थानीय कलाकारों की मुश्किलें सामने आ गई हैं। मेले के समाप्त होने के बावजूद कलाकारों को किसी प्रकार का पारिश्रमिक या सहायता नहीं मिल पाई है। इस विषय को लेकर क्षेत्र के कलाकारों में नाराजगी और चिंता का माहौल बना हुआ है।

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Ankit Yadav
02 अक्ट 2026, 11:22
चंबा समाचार: मिंजर मेले के बाद भी स्थानीय कलाकार खाली हाथ

मिंजर मेले के समापन के बाद कलाकारों की समस्या

चंबा में सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माने जाने वाले मिंजर मेले का आयोजन हर वर्ष बहुत धूमधाम के साथ किया जाता है। इस बड़े आयोजन में अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए दूर-दूर से स्थानीय कलाकार बड़ी उम्मीदों के साथ पहुंचते हैं। मेले के दौरान गीत, संगीत, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से ये कलाकार अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं और दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते हैं। मेला समाप्त होने के बाद हर बार की तरह इस बार भी स्थानीय कलाकारों को अपनी कला का उचित मेहनताना मिलने की पूरी उम्मीद थी। लेकिन इस बार का अनुभव इन कलाकारों के लिए बेहद निराशाजनक और चिंताजनक साबित हुआ है। मेला संपन्न हो चुका है और बड़े-बड़े मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां देने वाले ये कलाकार अभी भी पूरी तरह से खाली हाथ बैठे हुए हैं। उनके पास अपनी मेहनत का कोई भी पारिश्रमिक नहीं पहुंचा है जिससे उनके सामने कई तरह की आर्थिक परेशानियां खड़ी हो गई हैं। चंबा की समृद्ध संस्कृति को जीवित रखने वाले इन कलाकारों की सुध लेने वाला फिलहाल कोई भी जिम्मेदार अधिकारी सामने नहीं आ रहा है। कलाकार लंबे समय से अपनी इस समस्या के समाधान के लिए संबंधित विभागों के चक्कर काटने को मजबूर हो रहे हैं।

कलाकारों का दर्द और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल

स्थानीय स्तर पर कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के दावे तो बड़े-बड़े मंचों से लगातार किए जाते हैं लेकिन धरातल की स्थिति बिल्कुल अलग नजर आती है। मिंजर मेले के दौरान अपनी कला का जादू बिखेरने वाले कलाकारों का कहना है कि उन्हें इस बार आयोजकों की तरफ से केवल आश्वासन ही मिले हैं। प्रदर्शन के तुरंत बाद पारिश्रमिक का भुगतान करने का नियम होना चाहिए ताकि कलाकारों को किसी भी प्रकार की आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े। मेले के सफल आयोजन के लिए प्रशासनिक स्तर पर बजट का प्रावधान किया जाता है और तमाम समितियों का गठन भी किया जाता है। इसके बावजूद सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देने वाले कलाकारों को इस तरह से नजरअंदाज किया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक स्थिति है। कलाकारों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि वे अपनी कला के बल पर ही अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। ऐसे आयोजनों में समय पर भुगतान न मिलने से उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट पैदा हो जाता है। कई कलाकारों ने इस मामले को लेकर अपनी गहरी नाराजगी भी जाहिर की है और प्रशासन से तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग उठाई है। आयोजकों और संबंधित विभागों की इस उदासीनता के कारण कलाकारों का मनोबल भी अब लगातार गिरता जा रहा है।

सांस्कृतिक परंपरा और कलाकारों के अधिकारों की पृष्ठभूमि

चंबा का मिंजर मेला केवल एक सामान्य उत्सव नहीं बल्कि इस पहाड़ी क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का एक बहुत बड़ा प्रतीक है। इस मेले में देश और दुनिया भर से पर्यटक पहुंचते हैं और यहां की लोक संस्कृति तथा परंपराओं का आनंद उठाते हैं। इस आयोजन की असली जान यहां के स्थानीय कलाकार होते हैं जो अपनी लोक कला, संगीत और पारंपरिक नृत्यों के माध्यम से इस मेले को जीवंत बनाते हैं। यदि यही कलाकार आर्थिक तंगी और उपेक्षा के शिकार होते रहेंगे तो आने वाले समय में पारंपरिक कलाओं का संरक्षण करना बेहद कठिन हो जाएगा। किसी भी सांस्कृतिक आयोजन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें भाग लेने वाले कलाकारों का कितना सम्मान किया जाता है। इस प्रकार की खबरें न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं बल्कि कलाकारों के अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता को भी रेखांकित करती हैं। स्थानीय स्तर पर यह जरूरी हो गया है कि मेलों और उत्सवों के आयोजन से पहले कलाकारों के पारिश्रमिक और अनुबंधों को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाएं। भविष्य में इस तरह की समस्याओं से बचने के लिए जिला प्रशासन और मेला समितियों को पूरी पारदर्शिता के साथ काम करने की आवश्यकता है ताकि कलाकारों को हर बार इस तरह की निराशा का सामना न करना पड़े।

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