दवाओं के अचानक बढ़े दामों से मरीज परेशान
गोरखपुर के स्थानीय मेडिकल स्टोरों से दवाएं खरीदते समय आम लोगों को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। इटोलिव जैसी जरूरी दवा का मूल्य अचानक तीन गुना तक बढ़ जाने से मरीज हैरान हैं। दुकानदारों से पूछताछ करने पर वे नए बैच नंबर का हवाला देते हैं और लाभांश बहुत कम होने की बात कहते हैं। दुकानदारों का यह भी कहना होता है कि डॉक्टर साहब इस दवा को लिखते हैं, इसलिए इसे रखना उनकी मजबूरी है। यह समस्या केवल किसी एक दवा तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर के चिकित्सा तंत्र में यह एक व्यापक चलन बन चुका है। एलोपैथिक उपचार से लेकर आयुष पद्धति तक में ऐसी स्थितियां देखने को मिल रही हैं। आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के नाम पर भी ग्राहकों से मनमाने पैसे वसूले जा रहे हैं। डाबर जैसी बड़ी और प्रतिष्ठित कंपनियां त्रिफला, सतावर और अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियों को एक तय मूल्य पर बेचती हैं। इसके विपरीत, बाजार में मोनोपॉली चलाने वाले लोग इन्हीं जड़ी-बूटियों के नामों में मामूली हेरफेर करके उन्हें कई गुना अधिक कीमत पर बेच रहे हैं। डॉक्टर के पर्चे पर पूरा भरोसा करके मरीज और उनके तीमारदार बिना किसी सवाल के इन महंगी दवाओं को खरीद लेते हैं। इस पूरे खेल में आम जनता की जेब पर लगातार भारी बोझ पड़ रहा है और उन्हें अपनी बीमारी के इलाज के साथ आर्थिक शोषण का भी सामना करना पड़ रहा है।
कमीशन के लालच में लिखी जा रही खास दवाएं
एलोपैथिक दवाओं के कारोबार में भी कमीशन का यह जाल गहराई तक फैला हुआ है। धंधेबाज सीधे कंपनियों से संपर्क करके विशेष ब्रांड नेम के तहत दवाओं की पैकेजिंग करवाते हैं। इन दवाओं पर अपनी मर्जी से अत्यधिक अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी डलवाकर उन्हें खुले बाजार में उतारा जाता है। इसके बाद मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव या एमआर चिकित्सकों के पास पहुंचते हैं और उन्हें तीस से पचास प्रतिशत तक भारी कमीशन का लालच देते हैं। इस कमीशन के प्रलोभन में आकर चिकित्सक मरीजों के पर्चे पर उन्हीं खास कंपनियों की दवाएं लिखने के लिए राजी हो जाते हैं। शहर के कई निजी अस्पतालों के मेडिकल स्टोरों पर इस तरह की मोनोपॉली वाली दवाएं खुलेआम बेची जा रही हैं। स्थिति यह है कि शहर के एक बड़े चिकित्सक अपने खुद के नाम से मिलते-जुलते नामों वाली दवाएं रोगियों के पर्चे पर लिखते हैं। हैरानी की बात यह है कि वे विशेष दवाएं शहर के आम मेडिकल स्टोरों पर उपलब्ध नहीं होती हैं, बल्कि वे केवल उसी विशिष्ट अस्पताल के मेडिकल स्टोर पर ही मिलती हैं। इस प्रकार की व्यवस्था के जरिए मरीजों को बाहर से दवा खरीदने का विकल्प भी नहीं मिलता है और उन्हें मजबूरन अस्पताल के ही स्टोर से अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। डॉक्टर और दवा माफिया की इस सांठगांठ के कारण मरीजों का शोषण लगातार बढ़ता जा रहा है और इस पर रोक लगाने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा रहा है।
खाद्य एवं औषधि प्रशासन और नियंत्रण का अभाव
दवाओं के मूल्य निर्धारण और मनमाने एमआरपी के इस पूरे कारोबार पर स्थानीय स्तर पर कोई नियंत्रण नहीं है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन की टीम समय-समय पर बाजारों में जाकर दवाओं की गुणवत्ता और उनकी जांच करती है। हालांकि, उनके अधिकार क्षेत्र में मोनोपॉली और मनमानी कीमतें तय करने के इस खेल पर लगाम लगाना शामिल नहीं है। इस वजह से स्थानीय प्रशासनिक अमला इस प्रकार की अनियमितताओं पर कोई ठोस कानूनी कार्रवाई करने में असमर्थ साबित होता है। दवाओं के मूल्य को नियंत्रित करने और उस पर कार्रवाई करने का अधिकार केवल ड्रग प्राइस कंट्रोल अथॉरिटी के पास है। यह विशिष्ट प्राधिकरण पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधीन काम करता है और वही देश भर में दवाओं की कीमतों के मामलों को देखता है। स्थानीय स्तर पर जांच एजेंसियां होने के बावजूद मूल्य वृद्धि के इस गोरखधंधे पर रोक न लग पाना आम जनता के लिए बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। जब तक केंद्रीय एजेंसियां इस मामले में सीधे हस्तक्षेप नहीं करती हैं, तब तक मरीजों का यह आर्थिक शोषण यूं ही जारी रहने की आशंका बनी हुई है। रोगियों और उनके तीमारदारों को इस व्यवस्था के खिलाफ न्याय पाने के लिए किसी मजबूत और स्थानीय प्रशासनिक तंत्र की सख्त जरूरत महसूस हो रही है ताकि वे लुटने से बच सकें।