अवैध रूप से चल रहा था वाहन
लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी यानी केजीएमयू परिसर में तैनात एक एंबुलेंस का मामला प्रकाश में आया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह सरकारी सेवा वाहन पिछले पूरे एक दशक से बिना फिटनेस प्रमाणपत्र के शहर की सड़कों पर सेवाएं दे रहा था। किसी भी व्यावसायिक वाहन के लिए सड़क पर चलने हेतु परिवहन विभाग से समय-समय पर फिटनेस फिटनेस परीक्षण कराना अनिवार्य होता है, जिसका उद्देश्य वाहनों की यांत्रिक स्थिति को परखना होता है। हालांकि, इस एंबुलेंस के मामले में सुरक्षा नियमों की घोर अनदेखी की गई। यह वाहन दस साल से बिना पंजीकरण के नवीनीकरण और तकनीकी जांच के मरीजों को ले जाने का काम करता रहा। इतनी लंबी अवधि तक बिना फिटनेस के एंबुलेंस का चलना न केवल यातायात नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह उन मरीजों की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बना हुआ था जिन्हें इस वाहन के माध्यम से अस्पताल पहुंचाया जाता था। परिवहन विभाग के रिकॉर्ड में इस वाहन की फिटनेस स्थिति का कोई अद्यतन नहीं मिला है।
नियमों को ताक पर रखने का मामला
सड़क सुरक्षा के लिहाज से किसी भी एंबुलेंस का फिट होना अनिवार्य शर्त है ताकि आपातकालीन स्थितियों में किसी भी प्रकार की तकनीकी खराबी न आए। दस वर्ष की यह लंबी समयावधि यह दर्शाती है कि केजीएमयू प्रशासन की निगरानी व्यवस्था में बड़ी खामियां मौजूद थीं। आमतौर पर एंबुलेंस जैसी जीवन रक्षक गाड़ियों को हर साल तकनीकी निरीक्षण से गुजरना पड़ता है। फिटनेस सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही कोई वाहन सार्वजनिक मार्गों पर चलने के योग्य माना जाता है, जिसमें ब्रेक, टायर, इंजन और रोशनी की जांच की जाती है। केजीएमयू द्वारा संचालित इस विशेष एंबुलेंस ने इन सभी प्रक्रियाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया। यह स्पष्ट है कि पिछले दस वर्षों में किसी भी स्तर पर इस वाहन के दस्तावेजों की जांच या सत्यापन की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। संबंधित अधिकारियों द्वारा इस लापरवाही पर फिलहाल कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, लेकिन यह मामला सरकारी संस्थानों में वाहनों के रखरखाव और उनके कानूनी दस्तावेजों के प्रति व्याप्त ढिलाई को उजागर करने के लिए पर्याप्त है।
सुरक्षा मानकों पर मंडराया सवाल
पृष्ठभूमि के तौर पर देखा जाए तो सरकारी अस्पतालों में मरीजों के परिवहन के लिए उपयोग होने वाली एंबुलेंस के सुचारू संचालन की जिम्मेदारी संबंधित मेडिकल कॉलेज प्रशासन की होती है। बिना फिटनेस प्रमाणपत्र के दौड़ना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि यह एंबुलेंस के भीतर मौजूद गंभीर मरीजों के लिए जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। यदि रास्ते में कोई बड़ी तकनीकी समस्या उत्पन्न होती है, तो इसका सीधा खामियाजा मरीज को उठाना पड़ सकता है। यह घटना अब एक बड़ा सबक बनी है कि कैसे प्रशासनिक चूक के कारण नियमों का उल्लंघन लंबे समय तक चलता रहा। परिवहन विभाग के नियमों के अनुसार, बिना फिटनेस वाले वाहनों को जब्त करने या भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान है। इस खुलासे के बाद अब अन्य वाहनों की जांच और उनके दस्तावेजों के सत्यापन की मांग उठ सकती है। अस्पताल प्रशासन के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे अपने पूरे बेड़े की तत्काल जांच करवाएं ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी घातक चूक को होने से रोका जा सके और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।