झारखंड के लातेहार जिले में स्थित प्रमुख संरक्षित क्षेत्र पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) के भीतर इस बार विश्व बांस दिवस का आयोजन नहीं किया गया। प्रतिवर्ष इस विशेष अवसर पर जंगलों के भीतर बांस के पारिस्थितिक महत्व, इसके संरक्षण और वनों के संवर्धन को लेकर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों और जागरूकता अभियानों का आयोजन किया जाता रहा है। हालांकि, इस बार निर्धारित तिथि पर रिजर्व क्षेत्र या उसके आसपास के प्रशासनिक दायरों में ऐसा कोई आधिकारिक या सार्वजनिक कार्यक्रम देखने को नहीं मिला। इस संदर्भ में स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, वन विभाग या अन्य संबंधित प्राधिकारियों की ओर से इस महत्वपूर्ण पर्यावरणीय दिवस को लेकर किसी प्रकार की विशेष गतिविधि का संचालन नहीं किया गया, जिसके कारण यह दिन पूरी तरह से सामान्य गतिविधियों के बीच ही गुजर गया।
पलामू टाइगर रिजर्व देश के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण बाघ अभ्यारण्यों में शुमार किया जाता है, जहां जैव विविधता का संरक्षण और बांस जैसे प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता हमेशा से प्राथमिकता रही है। इस क्षेत्र के वनों में बांस के विशाल और सघन वन पाए जाते हैं, जो न केवल यहां के वन्यजीवों विशेषकर शाकाहारी जानवरों के लिए प्राकृतिक आहार का मुख्य स्रोत हैं, बल्कि रिजर्व के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में भी एक अहम भूमिका निभाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण संतुलन, जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने और वनों के दायरे को बढ़ाने के लिए बांस के पौधों के रोपण और उनकी सुरक्षा पर राष्ट्रीय स्तर पर विशेष जोर दिया जा रहा है। ऐसे में, पलामू टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील और समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्र में इस दिवस का वीरान रहना स्थानीय प्रकृति प्रेमियों के लिए एक निराशाजनक पहलू के रूप में सामने आया है, क्योंकि ऐसे मंच जंगलों की सुरक्षा और संरक्षण के प्रति आम जनता को जागरूक करने का एक बेहतरीन माध्यम माने जाते हैं।
इस घटनाक्रम के बाद अब स्थानीय पर्यावरणविदों और प्रकृति प्रेमियों द्वारा यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर इतने महत्वपूर्ण पर्यावरणीय दिवस पर इस प्रकार की उदासीनता क्यों बरती गई। जानकारों का मानना है कि इस तरह के आयोजनों के न होने से नई पीढ़ी और स्थानीय समुदायों में जंगलों के संरक्षण और बांस के आर्थिक व पर्यावरणीय महत्व को लेकर जो सकारात्मक संदेश जाना चाहिए था, वह नहीं पहुंच पाया है। आने वाले समय में यह जरूरी है कि वन विभाग और जिला प्रशासन मिलकर ऐसे आयोजनों को अनिवार्य रूप से अपनी कार्ययोजना में शामिल करें, ताकि प्रकृति और वनों के संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर जनता की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जा सके और पलामू टाइगर रिजर्व जैसी धरोहरों का महत्व लगातार समाज के सामने बना रहे।