पुरानी गाड़ियों पर प्रतिबंध की योजना
दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में जहरीली हवा के स्तर को कम करने के उद्देश्य से गठित 15 सदस्यीय एक्सपर्ट कमेटी ने एक विस्तृत कार्ययोजना सौंपी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, बीएस-1, बीएस-2 और बीएस-3 मानक वाली गाड़ियों को तत्काल प्रभाव से सड़कों से हटाना अनिवार्य है। यह कदम क्षेत्र के वायु प्रदूषण में इन वाहनों की भारी हिस्सेदारी को देखते हुए उठाया गया है। कमेटी ने अपनी सिफारिश में स्पष्ट किया है कि सर्दियों के दौरान जब प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक होता है, तब अतिरिक्त प्रतिबंध लागू किए जाने चाहिए। विशेष रूप से 1 नवंबर से 31 जनवरी के बीच इन सख्त पाबंदियों को प्रभावी बनाने का सुझाव दिया गया है। एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन को सौंपी गई यह रिपोर्ट 18 अगस्त को तैयार की गई थी और इसे हाल ही में सार्वजनिक किया गया है। इन पुरानी गाड़ियों के अलावा, अन्य श्रेणियों के वाहनों को भी चरणबद्ध तरीके से हटाने की विस्तृत समय-सीमा तय करने की सिफारिश की गई है ताकि प्रदूषण के स्रोतों को धीरे-धीरे खत्म किया जा सके।
चरणबद्ध तरीके से हटाए जाएंगे वाहन
एक्सपर्ट पैनल की सिफारिशों के मुताबिक, बीएस-4 श्रेणी की कारों को 2030 तक और बीएस-6 दो-पहिया वाहनों को 2035 तक पूरी तरह प्रतिबंधित करने का लक्ष्य रखा गया है। चार-पहिया बीएस-6 वाहनों को 2040 तक सड़कों से हटाने का प्रस्ताव है। पैनल ने यह भी सुझाव दिया है कि साल 2026 से ही दिल्ली-एनसीआर में बीएस-4 वाहनों पर रोक लगाने की शुरुआत की जानी चाहिए। इसके लिए सर्दियों में एक पायलट प्रोजेक्ट चलाने की योजना है, जिससे भविष्य में बड़े पैमाने पर पाबंदियां लागू की जा सकें। यदि 2035 के बाद वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी औसत एक्यूआई का स्तर 200 से अधिक बना रहता है, तो बीएस-6 वाहनों के परिचालन पर भी फिर से विचार किया जाएगा। दिल्ली-एनसीआर में वर्तमान में लगभग 2.21 करोड़ पंजीकृत गाड़ियां हैं, जिनमें से 57 फीसदी बीएस-4 या उससे पुरानी श्रेणी की हैं। बीएस-1 से बीएस-3 वाहनों की संख्या कुल वाहनों का केवल 30 फीसदी है, लेकिन प्रदूषण फैलाने में इनकी हिस्सेदारी लगभग 74 प्रतिशत है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है।
प्रदूषण नियंत्रण और आगे का रास्ता
समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि केवल दिल्ली-एनसीआर से गाड़ियाँ हटाना ही पर्याप्त नहीं है। ऐसी व्यवस्था बनाना जरूरी है जिससे दिल्ली-एनसीआर से बाहर की गई ये पुरानी और प्रदूषक गाड़ियाँ गंगा के मैदानी इलाकों के अन्य शहरों में न पहुँच सकें। कमेटी ने इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने और उन्हें बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया है, क्योंकि वर्तमान में क्षेत्र में कुल गाड़ियों में इलेक्ट्रिक वाहनों की भागीदारी केवल 1.6 फीसदी यानी 3.6 लाख ही है। प्रदूषण के खतरनाक स्तर को कम करने के लिए इन वाहनों की संख्या को बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते पुरानी गाड़ियों को चरणबद्ध तरीके से नहीं हटाया गया, तो हवा की गुणवत्ता में सुधार करना नामुमकिन होगा। प्रशासन को इन सिफारिशों को लागू करते समय यह सुनिश्चित करना होगा कि अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों का स्थानांतरण किसी अन्य प्रभावित क्षेत्र में न हो। आने वाले समय में इन वाहनों का परिचालन सीमित करना ही एकमात्र विकल्प बचता है ताकि जनता को स्वच्छ वातावरण प्रदान किया जा सके।