हादसे का विवरण और शुरुआती घटनाक्रम
घटना दस अक्टूबर की सुबह की है जब एलआइजी-156 स्थित मकान में रसोई गैस सिलेंडर से आंच बहुत धीमी आ रही थी। इस समस्या का समाधान पाने के उद्देश्य से हिमांशु गैस एजेंसी के एक हॉकर परवेज को मौके पर बुलाया गया था। जब परवेज वहां पहुंचे तो उन्होंने उपकरण की मरम्मत का काम शुरू किया और गैस के रिसाव की जांच कर रहे थे। उसी समय अचानक आग भड़क उठी और देखते ही देखते भयानक दुर्घटना घटित हो गई। इस आग की चपेट में आने से मकान मालिक रंजन दास, उनकी अर्धांगिनी जया दास, वहां कार्य करने वाली दशावती देवी और हॉकर परवेज गंभीर रूप से झुलस गए। इस भयानक हादसे के तुरंत बाद स्थानीय स्तर पर घायलों को संभालने के प्रयास किए गए। रंजन दास, उनकी पत्नी जया दास और सहायिका दशावती देवी को गंभीर हालत में नेहरू मेडिकल कालेज में उपचार के लिए भर्ती कराया गया था। वहीं दूसरी तरफ हॉकर परवेज को इलाज के लिए एक अलग निजी अस्पताल में ले जाया गया जहां उनका चिकित्सकीय देखभाल का कार्य शुरू हुआ। इस प्रकार यह दुर्घटना पूरे इलाके में सनसनी और शोक का बड़ा कारण बन गई।
उपचार के दौरान एक के बाद एक मौतें
अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद घायलों की स्थिति गंभीर बनी रही और एक-एक करके तीनों की जान चली गई। ग्यारह अक्टूबर की भोर में सबसे पहले रंजन दास ने उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। इसके कुछ दिनों बाद पंद्रह अक्टूबर को सुबह चार बजे के समय जया दास ने भी इलाज के दौरान अस्पताल में अंतिम सांस ली। इन दोनों की मौत के बाद सोमवार को सुबह साढ़े दस बजे दशावती देवी का भी निधन हो गया। इस तरह इस दुर्दांत हादसे में जान गंवाने वालों की कुल संख्या बढ़कर तीन हो गई है। दशावती देवी के छोटे बेटे अनिल ने इस पूरी घटना के लिए हॉकर परवेज की भारी लापरवाही को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया है। अनिल का कहना था कि यदि घटना के समय उनकी मां की बात को ध्यान से सुन लिया गया होता और सावधानी बरती जाती तो शायद तीन-तीन लोगों की अमूल्य जिंदगियां इस तरह असमय नहीं जातीं। इस प्रकार इस दुर्घटना ने कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है और लोगों के मन में सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
पीड़ित परिवार की पृष्ठभूमि और अंतिम संस्कार
दशावती देवी गुलरिहा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले हरसेवकपुर नंबर एक इलाके की रहने वाली थीं और उनके निधन से उनके परिवार पर दुखों का भारी पहाड़ टूट पड़ा है। उनके जीवन में संघर्ष बहुत अधिक था क्योंकि उनके पति का देहांत इस घटना से आठ वर्ष पूर्व ही हो चुका था। परिवार में उनके तीन बेटे और कुल पांच बेटियां थीं जिनमें से सात संतानों का विवाह पहले ही हो चुका है। दशावती देवी पिछले छह वर्षों से रंजन दास के घर पर बर्तन साफ करने और अन्य घरेलू साफ-सफाई का कार्य करती थीं। वह अपनी आजीविका चलाने के लिए प्रतिदिन नियमित रूप से सुबह और शाम दोनों समय काम पर जाया करती थीं। उनकी असामयिक मृत्यु से उनका पूरा परिवार पूरी तरह से बिखर गया है और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है। परिवार के बड़े बेटे सुनील ने राजघाट पर अपनी माता के पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी और अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी कीं। इस घटना के बाद से पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई है और हर कोई इस दुर्घटना से पीड़ित परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त कर रहा है।