नई दिल्ली से सामने आए ताजा मौसम विज्ञान के आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2026 का मानसून देश के इतिहास में पिछले सत्रह वर्षों की अवधि में सबसे अधिक सूखा रहने वाला मानसून बन गया है। इस वर्ष वर्षा ऋतु के दौरान सामान्य से काफी कम वर्षण दर्ज किया गया है, जिसके कारण देश के कई बड़े कृषि प्रधान और ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट और सूखे जैसे हालात पैदा होने की आशंका गहराई हुई है। समय पर सही मात्रा में बादलों के न बरसने के कारण किसानों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था बड़े पैमाने पर मानसूनी गतिविधियों और समय पर मिलने वाले पानी पर निर्भर करती है। इस स्थिति ने न केवल आम जनजीवन को प्रभावित किया है बल्कि देश के नीति निर्माताओं और कृषि विशेषज्ञों के माथे पर भी गहरी चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
इस अभूतपूर्व और चिंताजनक मौसमी सूखे के पीछे मुख्य रूप से प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाली मौसमी परिघटना 'अलनीनो' के प्रभाव को प्राथमिक कारण माना जा रहा है। जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि अलनीनो के कारण वैश्विक तापमान पैटर्न में आए बदलावों ने भारतीय उपमहाद्वीप की मानसूनी हवाओं की गति और उनकी नमी धारण करने की क्षमता को गंभीर रूप से बाधित किया है। जब भी प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म होता है, तब भारतीय मानसूनी चक्र कमजोर पड़ जाता है और देश के अधिकांश हिस्सों में बादलों की आवाजाही और वर्षा का स्तर सामान्य से बहुत नीचे चला जाता है। इस वर्ष भी कुछ ऐसा ही वैज्ञानिक चक्र देखने को मिला है जिसके परिणामस्वरूप हवाओं का रुख बदल गया और अपेक्षित मानसूनी बारिश देश के बड़े भूभाग पर समय पर बरसने में असमर्थ साबित हुई।
इस गंभीर स्थिति के दूरगामी और व्यापक परिणाम आने वाले महीनों में देश की आर्थिकी, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण बाजारों पर पड़ने की पूरी आशंका जताई जा रही है। कम बारिश के कारण खरीफ की फसलों के उत्पादन में गिरावट आने की संभावना है, जिससे आने वाले दिनों में खाद्यान्न की कीमतों में उछाल आ सकता है और महंगाई दर प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही भूजल स्तर में भारी गिरावट आने से पेयजल की उपलब्धता को लेकर भी गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं जिनसे निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को अभी से ही आपातकालीन रणनीतियों पर विचार करना होगा। यदि आने वाले समय में सर्दियों की बारिश या सिंचाई के वैकल्पिक साधनों का प्रभावी प्रबंधन नहीं किया गया, तो इस सूखे मानसून का असर देश की समग्र आर्थिक वृद्धि दर पर भी नकारात्मक रूप से पड़ सकता है।