उत्तर भारत में मौसम का नया रुख
भारतीय क्षेत्र से मानसून की विदाई लगभग पूरी हो चुकी है और कई राज्यों से इसकी पूरी तरह से विदाई दर्ज की जा चुकी है। उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान जैसे बड़े राज्यों से मानसूनी हवाएं पूरी तरह पीछे हट चुकी हैं। इसके अलावा बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ चुनिंदा हिस्सों से भी मानसून की विदाई हो चुकी है। आमतौर पर अक्टूबर माह के दौरान लोगों को वर्षा से पूरी तरह राहत मिलने की उम्मीद रहती है। लेकिन इस बार मौसमी परिदृश्य पूरी तरह भिन्न रहने वाला है क्योंकि आसमान में साफ और शुष्क मौसम टिकने वाला नहीं है। उत्तर-पश्चिमी हवाओं की दिशा में लगातार बदलाव आ रहा है और इसी क्रम में एक नया चक्रवाती परिसंचरण बनने के संकेत मिल रहे हैं। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार छह अक्टूबर से ही इस मौसमी बदलाव का असर मैदानी इलाकों में साफ तौर पर महसूस किया जाने लगेगा। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे मुख्य वजह पश्चिमी विक्षोभ का सक्रिय होना है जो उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में बादलों के जमघट और बारिश का मुख्य कारक बनेगा।
विभिन्न राज्यों में बारिश का शेड्यूल
छह अक्टूबर से शुरू होने वाले इस मौसमी बदलाव का असर देश के कई उत्तर भारतीय राज्यों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। इस क्रम में पहला पश्चिमी विक्षोभ मंगलवार के आसपास ज्यादा प्रभावी हो सकता है जिसका सीधा असर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम इलाकों पर पड़ेगा। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में भी इसका असर देखने को मिलेगा। हिमाचल प्रदेश के भीतर नौ और दस अक्टूबर को वर्षा होने की खासी संभावना जताई गई है। दूसरी तरफ पंजाब राज्य में सात अक्टूबर से ही रुक-रुककर बारिश का दौर शुरू होने की पूरी उम्मीद है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और पड़ोसी राज्य हरियाणा के कई हिस्सों में हल्की बौछारें पड़ने का अनुमान लगाया गया है। इसके बाद दस से बारह अक्टूबर के दौरान दूसरा पश्चिमी विक्षोभ कहीं अधिक मजबूत स्थिति में आ सकता है। इस दूसरे सिस्टम के प्रभाव से दस अक्टूबर के बाद बारिश का दायरा राजस्थान के दूरदराज इलाकों तक पहुंच सकता है। हालांकि मौसम विशेषज्ञों का यह भी स्पष्ट कहना है कि इन मैदानी इलाकों में होने वाली बारिश बहुत अधिक तीव्र या भारी नहीं होगी।
किसानों की चिंताएं और तापमान का हाल
मौसम में हो रहे इस अप्रत्याशित बदलाव का सीधा असर कृषि क्षेत्र और आम जनजीवन पर पड़ना स्वाभाविक है। अक्टूबर माह की इस बारिश से जहां एक ओर लोगों को दिन के समय गर्मी से खासी राहत मिलेगी, वहीं दूसरी ओर रातों के तापमान में भी हल्की ठंडक महसूस होने लगेगी। लेकिन दूसरी तरफ खेतों में इस समय खरीफ की फसलें या तो कट रही हैं या फिर पककर तैयार खड़ी हैं। ऐसे हालात में अचानक होने वाली यह बारिश किसानों की मुश्किलें बढ़ा सकती है क्योंकि कटी हुई फसल को सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। हालांकि कृषि दृष्टिकोण से खेतों में पर्याप्त नमी उपलब्ध होने के कारण गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों की शुरुआती बुवाई के लिए स्थितियां काफी अनुकूल हो जाएंगी। मौसम का यह पूरा चक्र इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि अब उत्तर भारत में बारिश का मुख्य स्रोत बदल चुका है। गर्मियों के महीनों यानी जून से सितंबर तक नमी बंगाल की खाड़ी और मानसूनी तंत्र से आती थी, जो अब कमजोर पड़ रही है। मानसून के कमजोर पड़ने के बाद अब पश्चिमी विक्षोभ ही अक्टूबर के महीने में इन तमाम इलाकों में वर्षा कराने की मुख्य भूमिका निभा रहा है।