गठबंधन में सीटों का बड़ा विवाद
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों के बंटवारे पर मतभेद सामने आए हैं। सत्ता से 37 वर्षों से दूर चल रही कांग्रेस राज्य में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए सपा के साथ गठबंधन का प्रयास कर रही है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी ने सपा को पिछले सप्ताह 200 विधानसभा सीटों की एक विस्तृत सूची सौंपी है। इस सूची के जरिए कांग्रेस पार्टी राज्य में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी कर रही है। हालांकि, समाजवादी पार्टी का नेतृत्व कांग्रेस की इतनी बड़ी मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है। गठबंधन की बातचीत अभी शुरुआती दौर में है और दोनों दलों के शीर्ष नेता जल्द ही इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे। अभी तक दोनों पक्षों के बीच किसी ठोस समझौते पर सहमति नहीं बन पाई है। इस खींचतान के कारण राज्य में राजनीतिक समीकरणों को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
सपा का रुख और जीत का आधार
समाजवादी पार्टी के भीतर कांग्रेस की भारी भरकम सीटों की मांग को लेकर काफी संशय बना हुआ है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दिया है कि गठबंधन के तहत कांग्रेस को 55 से अधिक सीटें नहीं दी जाएंगी। सपा नेतृत्व इस संख्या को अधिकतम सीमा मानकर चल रहा है। वहीं, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति साफ कर दी है। उन्होंने घोषणा की है कि सीटों का आवंटन केवल जीत की संभावनाओं के आधार पर ही किया जाएगा। पार्टी का मानना है कि जिन क्षेत्रों में जीत निश्चित है, वहां कांग्रेस को अधिक जगह देने का कोई औचित्य नहीं है। इस कारण से कांग्रेस द्वारा मांगी गई 200 सीटों की मांग सपा के लिए तर्कहीन प्रतीत हो रही है। अब दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा करने के लिए एक नई रूपरेखा तैयार की जानी है, जिसमें जीत का आधार ही सबसे प्रमुख मानक होगा।
पिछले चुनावी प्रदर्शन का असर
कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दशकों का चुनावी इतिहास बेहद निराशाजनक रहा है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा और पार्टी केवल दो सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी थी। इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का प्रदर्शन खराब था और उसे मात्र सात सीटें ही हासिल हुई थीं। लगातार खराब प्रदर्शन के कारण ही समाजवादी पार्टी कांग्रेस को अधिक सीटें देने से बच रही है। सपा का मानना है कि कमजोर प्रदर्शन वाली पार्टी को अधिक सीटें देना चुनावी नुकसान का कारण बन सकता है। कांग्रेस हालांकि लगातार गठबंधन में बराबरी की हिस्सेदारी की बात दोहरा रही है। दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व को यह तय करना है कि क्या वे पुरानी हार को दरकिनार कर भविष्य के लिए कोई नया रास्ता निकाल पाएंगे। अभी तक कांग्रेस की 200 सीटों की मांग सपा के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, जिस पर आगे चर्चा जारी रहेगी।