विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था संयुक्त राज्य अमेरिका इस समय एक अभूतपूर्व वित्तीय संकट के मुहाने पर खड़ी है। अमेरिकी वित्त विभाग द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, देश का कुल राष्ट्रीय कर्ज इतिहास में पहली बार $40 ट्रिलियन का विशाल आंकड़ा पार कर गया है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, कर्ज में हुई यह वृद्धि बेहद चिंताजनक गति से हुई है, जहां केवल पिछले कुछ महीनों के भीतर ही $1 ट्रिलियन का नया कर्ज जुड़ गया। यह स्थिति अमेरिका की वित्तीय नीतियों, सरकारी खर्चों और भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
कर्ज के इस ऐतिहासिक रिकॉर्ड के पीछे के मुख्य कारण
अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर लगातार बढ़ते इस बोझ के पीछे कई ढांचागत और नीतिगत कारण जिम्मेदार हैं। महामारी के दौर से लेकर अब तक सरकार द्वारा लागू की गई आर्थिक नीतियों ने घाटे को बढ़ाने का काम किया है।
पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर अनियंत्रित खर्च: अमेरिकी आबादी में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या के कारण 'सोशल सिक्योरिटी' और 'मेडिकेयर' जैसी सरकारी जनकल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बजट की सीमा से बाहर जा रहा है।
उच्च ब्याज दरें और ब्याज का बढ़ता बोझ: फेडरल रिजर्व द्वारा महंगाई पर काबू पाने के लिए बढ़ाई गई ब्याज दरों के कारण अमेरिकी सरकार को पुराने और नए कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए ही खरबों डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। वर्तमान में ब्याज का यह भुगतान रक्षा बजट से भी अधिक हो चुका है।
राजस्व की कमी और कर कटौती: सरकार द्वारा बड़े निगमों और उच्च आय वर्ग को दी गई टैक्स छूट के चलते सरकारी खजाने में राजस्व का संग्रह उस अनुपात में नहीं हो पा रहा है जिस गति से सरकारी खर्च बढ़ रहे हैं।
वैश्विक और सामरिक खर्च: रक्षा बजट, विदेशी सैन्य सहायता और आंतरिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर भारी-भरकम आवंटन ने बजट घाटे (Budget Deficit) को रिकॉर्ड स्तर पर बनाए रखा है।
अमेरिकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव
इतने विशालकाय कर्ज का असर न केवल अमेरिकी नागरिकों की जेब पर पड़ेगा, बल्कि इसका वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
बाजार में सरकारी बांड्स की अधिकता के कारण निवेशकों को लुभाने के लिए सरकार को ऊंची ब्याज दरें देनी पड़ रही हैं, जिससे आम लोगों के लिए होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन बेहद महंगे होते जा रहे हैं। जब बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में चला जाएगा, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास के लिए सरकारी फंड की भारी कमी हो जाएगी।
इसके अलावा, दुनिया भर में अमेरिकी डॉलर की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है, जिससे कई देश अपनी संपत्तियों को डॉलर के बजाय अन्य विकल्पों में शिफ्ट करने की कोशिश कर सकते हैं।
वैश्विक अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि अमेरिकी वाशिंगटन के नीति निर्माताओं ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कर सुधारों, खर्चों में कटौती और जिम्मेदार बजटीय नीतियां नहीं बनाईं, तो यह वित्तीय संकट आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक मंदी की वजह बन सकता है।