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अमेरिकी ट्रेजरी के कदम से वैश्विक बॉन्ड बाजार में सुधार: सरकारी बांड यील्ड में गिरावट और बाजारों को राहत

अमेरिकी ट्रेजरी के बॉन्ड पुनर्खरीद संबंधी कदमों के बाद वैश्विक बॉन्ड बाजार में सुधार दिखाई दिया।

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Ankit Yadav
20 अग 2026, 16:42
अमेरिकी ट्रेजरी के कदम से वैश्विक बॉन्ड बाजार में सुधार


अमेरिकी वित्त विभाग द्वारा बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए बांड बायबैक कार्यक्रम के आकार को दोगुना करने के ऐलान के बाद वैश्विक बॉन्ड बाजार को बड़ी राहत मिली है। लंबे समय वाले बांड्स की खरीदारी सीमा को $2 अरब से बढ़ाकर कम से कम $4 अरब प्रति ऑपरेशन करने के इस फैसले से वैश्विक स्तर पर सरकारी बांड्स की यील्ड में गिरावट दर्ज की गई, जिससे बॉन्ड की कीमतों में तेजी आई और व्यापक वित्तीय बाजारों में सुधार देखा गया।

अमेरिकी ट्रेजरी के फैसले का प्रभाव और वैश्विक बाजार में राहत

बढ़ते सरकारी कर्ज और मुद्रास्फीति की चिंताओं के कारण हाल के दिनों में अमेरिकी और यूरोपीय बांड्स की यील्ड कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। ट्रेजरी के इस रणनीतिक हस्तक्षेप ने बांड बाजार के दबाव को कम करने का काम किया है।

  • बांड यील्ड्स में गिरावट: निर्णय के तुरंत बाद अमेरिकी 30-वर्षीय और 10-वर्षीय बांड यील्ड्स में 10 बेसिस पॉइंट्स तक की गिरावट दर्ज की गई। इसका सीधा असर यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के बांड बाजारों पर भी पड़ा, जहां यील्ड में नरमी आई।

  • शेयर बाजारों को सहारा: सरकारी बांड यील्ड्स में गिरावट से कंपनियों और आम नागरिकों के लिए उधार लेने की लागत कम होने की उम्मीद बंधी है। इसके चलते अमेरिकी और एशियाई शेयर बाजारों के बेंचमार्क सूचकांकों में मजबूती देखने को मिली।

  • डॉलर में नरमी और डॉलर-संबंधित परिसंपत्तियों पर असर: बांड यील्ड कम होने से अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में गिरावट आई, जिससे सोने और अन्य उभरते बाजारों की मुद्राओं को बल मिला।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए इसके क्या मायने हैं?

अमेरिकी ट्रेजरी बांड वैश्विक वित्तीय प्रणाली के लिए मानक का काम करते हैं। यदि अमेरिकी बांड यील्ड अनियंत्रित रूप से बढ़ती है, तो दुनिया भर में होम लोन, कॉरपोरेट लोन और सरकारी कर्ज महंगे हो जाते हैं।

अमेरिकी वित्त विभाग के इस तरलता सहायता कदम ने यह संकेत दिया है कि नीति निर्माता बांड बाजार में किसी भी प्रकार की अस्थिरता को रोकने के लिए तैयार हैं। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए सरकारों को अपने बढ़ते बजट घाटे और जारी रहने वाले मुद्रास्फीति के दबावों पर नियंत्रण पाना होगा।

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