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बड़ा सवाल: बाराबंकी की घटना के बाद अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले पर उठे गंभीर राजनीतिक सवाल
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुई एक हालिया घटना ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस मामले के सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया अखिलेश यादव के प्रमुख पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पर विरोधी दलों द्वारा तीखे सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
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Ankit Yadav
22 अग 2026, 12:50
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से सामाजिक न्याय और समीकरणों के इर्द-गिर्द तीखी बहस छिड़ गई है। हाल ही में बाराबंकी जिले में हुई एक सनसनीखेज घटना के बाद से राजनीतिक गलियारों में खलबली मची हुई है। इस पूरी चर्चा के केंद्र में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का वह बहुप्रचारित राजनीतिक फॉर्मूला है, जिसे वह पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नाम से प्रचारित करते आए हैं। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि जब भी किसी मामले में यादव या मुस्लिम समुदाय से जुड़े आरोपी सामने आते हैं, तब विपक्षी दलों और विशेषकर समाजवादी पार्टी के नेताओं की तरफ से एक रहस्यमयी चुप्पी साध ली जाती है, जो उनके दोहरे रवैये को उजागर करती है।
चुप्पी पर सियासत तेज
इस ताजा घटनाक्रम ने राज्य के राजनीतिक क्षितिज पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में न्याय की मांग करते वक्त आरोपियों की जाति या धर्म देखकर प्रतिक्रिया देना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सही नहीं है। जब इस तरह के मामलों में चुनिंदा मौकों पर ही आवाज उठाई जाती है और अन्य मामलों में पूरी तरह से किनारा कर लिया जाता है, तो जनता के बीच गलत संदेश जाता है। विरोधी दलों के नेताओं का साफ तौर पर यह कहना है कि अखिलेश यादव अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार ही मुद्दों का चयन करते हैं, जिससे उनके पीडीए समीकरण की नीयत पर बदनुमा दाग लगता है। बाराबंकी की इस घटना ने जनता के मन में भी इस बात को लेकर बहस छेड़ दी है कि क्या राजनीतिक दलों के लिए न्याय की परिभाषा भी बदल जाती है।
समाजवादी पार्टी के खेमे में इस घटना और उसके बाद शुरू हुई तीखी आलोचनाओं को लेकर भारी बेचैनी देखी जा रही है। पार्टी के रणनीतिकार इस बात को लेकर मंथन कर रहे हैं कि किस प्रकार से इन तीखे हमलों का जवाब दिया जाए, क्योंकि आने वाले दिनों में यह मुद्दा चुनावों के लिहाज से बहुत बड़ा साबित हो सकता है। विपक्षी दलों द्वारा लगातार यह आरोप लगाया जा रहा है कि पीडीए का यह नारा असल में केवल एक खास वर्ग को साधने और अपने राजनीतिक हितों को सुरक्षित रखने का जरिया मात्र है। जनता के बीच भी अब यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या नेताओं की संवेदनशीलता भी वोट बैंक की राजनीति के हिसाब से ही तय होती है।
इस पूरे विवाद के बीच राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में और अधिक तूल पकड़ेगा। सभी दलों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस मामले में आगे क्या कानूनी और राजनीतिक कदम उठाए जाते हैं। जनता भी अब यह भली-भांति समझने लगी है कि किस प्रकार से हर छोटी-बड़ी घटना को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है। कुल मिलाकर, बाराबंकी की इस घटना ने एक बार फिर से इस बात को साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति, धर्म और समीकरण हमेशा से ही सबसे बड़े और संवेदनशील केंद्र बिंदु बने रहेंगे, जिन पर आगे भी लंबी बहस जारी रहने की पूरी संभावना है।