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राजनीति की कीमत: इतिहास की यादों और वर्तमान की सियासत पर एक गंभीर बहस

देश में ऐतिहासिक स्मृतियों और प्रतीकों को लेकर चल रही राजनीति ने सामाजिक ताने-बाने पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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Kantap News डेस्क
13 अग 2026, 16:53
राजनीति की कीमत: इतिहास की यादों और वर्तमान की सियासत पर एक गंभीर बहस
समकालीन भारतीय राजनीति में इतिहास के पन्नों को पलटने और अपने अनुकूल आख्यान गढ़ने की होड़ सी लग गई है। विश्लेषकों का मानना है कि ऐतिहासिक घटनाओं और पात्रों का इस्तेमाल जब तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है, तो समाज में दूरगामी और नकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। इस प्रकार की राजनीति से न केवल आपसी सौहार्द बिगड़ता है, बल्कि राष्ट्र निर्माण के वास्तविक मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं। आम नागरिकों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या हमारे नीति-निर्माता भविष्य की चुनौतियों से निपटने के बजाय केवल अतीत के विवादों में ही उलझे रहना चाहते हैं।

स्मृतियों के राजनीतिक इस्तेमाल के खतरे

विभिन्न वैचारिक मंचों पर इस बात की तीव्र आलोचना हो रही है कि कैसे राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेकने के लिए संवेदनशील ऐतिहासिक मामलों को हवा देते हैं। इसके कारण युवा पीढ़ी के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है और वे वास्तविक विकासोन्मुखी एजेंडे से भटक रहे हैं। बुद्धिजीवियों का कहना है कि इतिहास का अध्ययन आत्ममंथन और सीखने के लिए होना चाहिए, न कि नफरत की दीवारें खड़ी करने के लिए। जब तक राजनीतिज्ञ इस प्रवृत्ति से तौबा नहीं करेंगे, तब तक समाज में समरसता स्थापित करना एक कठिन चुनौती बना रहेगा।

समाधान की तलाश और भविष्य की राह

इस नकारात्मक चक्र से बाहर निकलने के लिए आवश्यक है कि शिक्षा और सार्वजनिक बहसों में सकारात्मकता को बढ़ावा दिया जाए। राजनीतिक दलों को अपनी संकीर्ण प्राथमिकताओं को छोड़कर देश की सामूहिक प्रगति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जनता को भी यह समझना होगा कि कौन सी नीतियां उन्हें आगे ले जा रही हैं और कौन सी उन्हें पीछे धकेल रही हैं। एक परिपक्व लोकतंत्र की यही मांग है कि अतीत के जख्मों को कुरेदने के बजाय भविष्य के निर्माण पर ऊर्जा खर्च की जाए।
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