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ऐतिहासिक यात्रा: भारतीय विदेश मंत्री ने बाकू के प्राचीन अग्नि मंदिर का किया दौरा

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अज़रबैजान के बाकू शहर में स्थित प्राचीन अतेशगाह अग्नि मंदिर का अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने दोनों देशों के बीच प्राचीन सांस्कृतिक जुड़ाव का उल्लेख किया। मंदिर परिसर में देवनागरी लिपि में खुदे हुए धार्मिक अभिलेख मौजूद हैं।

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Ankit Yadav
24 अक्ट 2026, 14:18
ऐतिहासिक यात्रा: भारतीय विदेश मंत्री ने बाकू के प्राचीन अग्नि मंदिर का किया दौरा

भारतीय विदेश मंत्री का बाकू स्थित मंदिर का दौरा

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर इन दिनों अज़रबैजान की आधिकारिक यात्रा पर गए हुए हैं। इसी क्रम में उन्होंने शुक्रवार के दिन अज़रबैजान की राजधानी बाकू के निकट बने ऐतिहासिक अतेशगाह अग्नि मंदिर में जाकर उसका मुआयना किया। इस महत्वपूर्ण यात्रा के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें साझा कीं और एक संदेश भी लिखा। उन्होंने अपने संदेश में स्पष्ट किया कि बाकू का यह पुराना अग्नि मंदिर दोनों राष्ट्रों के नागरिकों के मध्य चले आ रहे पुराने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बंधनों का जीता-जाता सबूत है। अज़रबैजान मुख्य रूप से कैस्पियन सागर के किनारे बसा एक छोटा मुस्लिम बहुल देश है जो कभी सोवियत संघ का अभिन्न अंग हुआ करता था। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और प्राचीन वास्तुकला दुनिया भर के पर्यटकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करती रही है। भारतीय विदेश मंत्री के इस कदम से दोनों देशों के कूटनीतिक तथा सांस्कृतिक संबंधों को एक नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर भी इस दौरे को लेकर काफी चर्चा रही और भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने इस पूरी यात्रा के दौरान व्यवस्थाओं पर पूरी नजर बनाए रखी। बाकू में स्थित यह स्थल दोनों संस्कृतियों के पुराने मेलजोल का एक जीवंत केंद्र माना जाता है जहाँ हर साल कई लोग पहुंचते हैं।

मंदिर के भीतर देवनागरी लिपि और प्राचीन अभिलेख

बाकू के सुराखानी इलाके के पास बने इस प्राचीन मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके भीतर मौजूद भारतीय अवशेष हैं। बाकू स्थित भारतीय दूतावास से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस पूरे परिसर में देवनागरी लिपि में कुल 18 शिलालेख या अभिलेख उत्कीर्ण किए गए हैं। इनमें से ज्यादातर लेखों की शुरुआत भगवान गणेश की वंदना से होती है जहाँ देवनागरी अक्षरों में स्पष्ट रूप से श्री गणेशाय नमः लिखा हुआ देखा जा सकता है। इसके अलावा देवनागरी लिपि की पांच अन्य पंक्तियां भी यहाँ मौजूद हैं जिनमें हिंदू धर्म की अग्नि देवी ज्वाला जी के साथ-साथ अन्य हिंदू देवी-देवताओं का भी पूरी श्रद्धा के साथ आह्वान किया गया है। रिकॉर्ड के मुताबिक यहाँ ज्वाला जी का नाम एक दर्जन से भी अधिक बार दर्ज किया गया है जो यहाँ की परंपराओं में भारतीय प्रभाव को साफ तौर पर दर्शाता है। इस परिसर के पत्थरों पर उकेरे गए लेखों में संस्कृत भाषा के साथ-साथ पंजाबी भाषा के शब्द भी शामिल हैं जो यहाँ आने वाले यात्रियों की विविधता को बयां करते हैं। अज़रबैजान द्वारा यूनेस्को को सौंपे गए दस्तावेजों में इस बात का जिक्र मिलता है कि यह स्थान मुल्तान के श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ और दार्शनिक केंद्र हुआ करता था। मुल्तान वर्तमान समय में पाकिस्तान का हिस्सा है लेकिन उस दौर में वह भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े वाणिज्यिक और धार्मिक तंत्र का एक अहम हिस्सा माना जाता था। यहाँ के व्यापारी कैस्पियन क्षेत्र के साथ व्यापार करने आते थे और इस मंदिर के रख-रखाव के लिए आर्थिक मदद भी प्रदान करते थे।

प्राकृतिक गैस की ज्वालाएं और यूनेस्को संरक्षण

यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार यहाँ बनी इमारतें मुख्य रूप से 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच के कालखंड की हैं। अबशेरोन प्रायद्वीप की ज़मीन के भीतर से भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस निकलती थी जिसकी वजह से वहाँ सतह पर आग की प्राकृतिक लपटें उठती रहती थीं। इसी भूगर्भीय घटना ने इस स्थान को सदियों पहले अत्यधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व प्रदान किया था। शुरुआती इतिहासकार इस स्थान का नाता पारसी धर्म से जोड़ते हैं क्योंकि यहाँ लंबे समय तक अग्नि-पूजकों का आना-जाना लगा रहा था। 1683 में यहाँ पहुंचे जर्मन यात्री एंगेलबर्ट कैम्फर ने अपने यात्रा वृत्तांत में दर्ज किया था कि उस शताब्दी के मध्य के आसपास तीर्थयात्रियों ने इस मंदिर का नए सिरे से निर्माण कार्य शुरू किया था। धीरे-धीरे काम आगे बढ़ा और 19वीं सदी की शुरुआत तक इस पूरे परिसर ने अपना वर्तमान स्वरूप पूरी तरह प्राप्त कर लिया। पेट्रोलियम उद्योगों के विस्तार के चलते 1883 में यहाँ पूजा-पाठ का सिलसिला पूरी तरह थम गया और बाद में इसे एक संग्रहालय के रूप में तब्दील कर दिया गया। वर्ष 1969 में जब इस परिसर की मरम्मत का काम चल रहा था तब वर्तमान संरचना के ठीक नीचे पुरानी इमारत के कुछ हिस्से बरामद हुए थे जो इसके प्राचीन इतिहास की गवाही देते हैं। आगे चलकर 1975 में इसे व्यवस्थित रूप से संग्रहालय बना दिया गया और फिर 1998 में इस अनूठे स्थल को आधिकारिक तौर पर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया गया।

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