परकोटे की प्राचीन संरचनाओं का ड्रोन सर्वे
राजस्थान की राजधानी जयपुर का ऐतिहासिक परकोटा इलाका इन दिनों पुरानी इमारतों के रख-रखाव और आधुनिकीकरण के दबाव के बीच अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। लगभग 300 वर्ष पुरानी पारंपरिक वास्तुकला, विशाल चौकड़ियां, नक्काशीदार झरोखे और अनूठे बाजार इस प्राचीन नगर की मुख्य पहचान हैं। लंबे समय से उपेक्षित रहने के कारण कई पुरानी हवेलियां और मकान आज पूरी तरह जीर्ण-शीर्ण हालत में बदल चुके हैं। इन जर्जर हो चुकी इमारतों में से कई जगहों पर कोई निवासी नहीं रहता है, जबकि अन्य स्थानों पर किराएदार जमे हुए हैं। इसके अलावा कई संपत्तियों में मकान मालिक और किराएदारों के बीच चल रहे कानूनी विवादों के कारण भी भवनों की समय पर मरम्मत और देखभाल संभव नहीं हो पा रही है। इसी स्थिति से निपटने के लिए वर्ष 2020 के दौरान नगर निगम और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से इस संपूर्ण क्षेत्र का एक विशेष ड्रोन आधारित सर्वेक्षण कराया गया था। इस तकनीकी अभियान के तहत वॉल सिटी के भीतर स्थित प्रत्येक संपत्ति की भौतिक स्थिति का आकलन किया गया और एक-एक प्लॉट को चिह्नित किया गया ताकि इस अनमोल ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और संवर्धन के लिए ठोस कदम उठाए जा सके।
जियो-टैगिंग और उल्लंघन करने वाली संपत्तियां
विस्तृत दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए अधिकारियों ने वर्ष 2022 से 2024 के बीच एक विशेष अभियान चलाया। इस समयावधि में कंसल्टेंट के माध्यम से परकोटे के लगभग 6.74 वर्ग किलोमीटर के दायरे में आने वाली करीब 45 हजार संपत्तियों की जियो-टैगिंग का कार्य पूरा किया गया। इस व्यापक डिजिटल सर्वे के दौरान प्रत्येक मकान की भौगोलिक स्थिति के साथ उसकी पुरानी तस्वीरें, निर्माण वर्ष, वास्तुकला का महत्व और इतिहास से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारियां आधिकारिक तौर पर दर्ज की गईं। रिकॉर्ड में यह भी खंगाला गया कि उस विशेष भवन से अतीत में कौन से प्रसिद्ध कलाकार, व्यापारी या विशिष्ट परिवार जुड़े रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया के आधार पर विशेषज्ञों ने लगभग 1000 से अधिक ऐसे महत्वपूर्ण ढांचों की पहचान की है जिनका ऐतिहासिक या स्थापत्य की दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। इसके अतिरिक्त वर्ष 2020 के ड्रोन सर्वे के दौरान 700 से अधिक ऐसी संपत्तियां भी सामने आई थीं जहाँ नियमों का उल्लंघन करते हुए मूल फसाड, रंगों और झरोखों में अवैध फेरबदल किए गए थे। इन सभी उल्लंघनों के मामलों में संबंधित भवन मालिकों को प्रशासनिक अधिकारियों की तरफ से उचित कानूनी नोटिस भी जारी किए गए ताकि गुलाबी नगरी की मूल वास्तुकला को बचाया जा सके।
विश्व विरासत का दर्जा और संरक्षण के नए विकल्प
अजरबैजान की राजधानी बाकू में जुलाई 2019 में आयोजित यूनेस्को की बैठक के दौरान जयपुर शहर को आधिकारिक रूप से विश्व विरासत स्थल का प्रतिष्ठित दर्जा प्रदान किया गया था। इस ऐतिहासिक उपलब्धि से पहले वर्ष 2018 में एक विस्तृत डोजियर तैयार करके यूनेस्को के समक्ष पेश किया गया था, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम ने शहर का निरीक्षण किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि जयपुर का महत्व केवल पुरानी इमारतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कला, संस्कृति, वास्तुकला और प्राचीन व्यापारिक परंपराएं भी समाहित हैं। वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या उन जर्जर हवेलियों की है जिनके मालिक बाहर रहते हैं और उनसे कोई वित्तीय आय न होने के कारण वे मरम्मत पर खर्च करने से कतराते हैं। दूसरी ओर, खतरनाक हो चुकी इमारतों को गिराना प्रशासन की मजबूरी बन जाता है क्योंकि जनता की सुरक्षा सबसे सर्वोपरि है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए बिल्डिंग बायलॉज में एडाप्टिव रीयूज यानी अनुकूलित उपयोग की व्यवस्था जोड़ी गई है। इसके तहत मालिकों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे अपनी इन ऐतिहासिक हवेलियों को होमस्टे, हेरिटेज गेस्ट हाउस, पारंपरिक रेस्टोरेंट या सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्रों के रूप में विकसित करें। इस नई योजना का मुख्य उद्देश्य यह है कि हवेलियों का मूल स्वरूप भी सुरक्षित रहे और उनके मालिकों को नियमित आमदनी का साधन भी मिल सके जिससे वे अपनी पुरानी संपत्ति की देखभाल स्वयं कर सकें।