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राजनीति

राजनीतिक बहस: पी चिदंबरम के ब्रिक्स सवाल पर शशि थरूर ने दिया करारा जवाब

ब्रिक्स संगठन के औचित्य और इससे देश को मिलने वाले फायदों को लेकर कांग्रेस पार्टी के भीतर ही अलग-अलग विचार सामने आए हैं। वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम द्वारा उठाए गए सवालों के बाद शशि थरूर ने इसका विस्तार से जवाब देते हुए भारत को होने वाले लाभों की पूरी सूची गिनाई है।

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Ankit Yadav
12 सित 2026, 12:47
राजनीतिक बहस: पी चिदंबरम के ब्रिक्स सवाल पर शशि थरूर ने दिया करारा जवाब
देश के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मंचों और आर्थिक संगठनों में भारत की भूमिका पर अक्सर चर्चा होती रहती है। इसी क्रम में हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने सार्वजनिक तौर पर यह सवाल उठाया था कि भारत को ब्रिक्स (BRICS) समूह से आखिर क्या ठोस हासिल हुआ है। उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया, क्योंकि इस प्रकार के बहुपक्षीय संगठनों की उपयोगिता को लेकर समय-समय पर विश्लेषक भी अपने विचार रखते आए हैं। चिदंबरम के इस तीखे सवाल पर साथी नेता और जाने-माने सांसद शशि थरूर ने अपनी प्रतिक्रिया दी और देश को इस वैश्विक मंच से मिलने वाले विभिन्न रणनीतिक व आर्थिक फायदों के बारे में खुलकर अपनी बात रखी।

शशि थरूर ने गिनाए ब्रिक्स के फायदे

शशि थरूर ने चिदंबरम के सवाल का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि इस अंतरराष्ट्रीय संगठन का हिस्सा रहने से देश को कूटनीतिक और आर्थिक दोनों ही मोर्चों पर काफी लाभ मिलता है। थरूर के अनुसार, ब्रिक्स जैसे मंच विकासशील देशों को वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत आवाज उठाने का अवसर प्रदान करते हैं। इसके माध्यम से भारत न केवल अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति को भी सुदृढ़ बनाता है। बहुपक्षीय कूटनीति के इस दौर में ऐसे संगठनों से दूरी बनाने के बजाय इनके साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहना देश के दीर्घकालिक हितों में बेहद महत्वपूर्ण है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति में नई संभावनाएं खुलती हैं। राजनीतिक हलकों में इस वैचारिक आदान-प्रदान को लेकर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जानकारों का मानना है कि किसी भी बड़े संगठन के प्रभाव का आकलन करते समय उसके अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों ही परिणामों का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए। एक तरफ जहां चिदंबरम जैसे नेता इसके प्रत्यक्ष और त्वरित परिणामों पर सवाल खड़े कर रहे हैं, वहीं थरूर का यह दृष्टिकोण वैश्विक कूटनीति की जटिलताओं और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को रेखांकित करता है। इस पूरी चर्चा से यह भी साफ होता है कि देश के राजनीतिक दलों के भीतर विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय समझौतों जैसे गंभीर विषयों पर खुले तौर पर मंथन और वैचारिक चर्चा की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। आने वाले दिनों में इस तरह की बहसें और अधिक जोर पकड़ सकती हैं, क्योंकि भारत वैश्विक स्तर पर एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी सक्रियता लगातार बढ़ रही है। चाहे वह आर्थिक सहयोग का मुद्दा हो या फिर भू-राजनीतिक स्थिरता का, ब्रिक्स जैसे संगठन दुनिया के बड़े देशों के साथ समन्वय स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्षी खेमे के अन्य वरिष्ठ नेता इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या आने वाले समय में पार्टी के भीतर इस नीति को लेकर कोई औपचारिक सहमति या वैचारिक स्पष्टता सामने आती है या नहीं।
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