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बड़ा खतरा: हिमालय क्षेत्र में 188 ग्लेशियल झीलें कभी भी फट सकती हैं, केंद्र सरकार ने शुरू की अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी
हिमालयी क्षेत्रों में मंडराते खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। यहाँ स्थित कुल 188 ग्लेशियल झीलों के फटने की आशंका को भांपते हुए अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
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Ankit Yadav
30 अग 2026, 13:28
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय चुनौतियों और जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी बीच एक बेहद चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि हिमालय के विभिन्न हिस्सों में कुल 188 ग्लेशियल झीलें ऐसी हैं जो किसी भी समय फटने का जोखिम पैदा कर सकती हैं। इन झीलों के अचानक फटने से निचले इलाकों में भारी तबाही मच सकती है और जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। इस गंभीर खतरे को समय रहते भांपते हुए केंद्र सरकार ने अब पुख्ता कदम उठाने का निर्णय लिया है और इन संवेदनशील जल स्रोतों के आसपास अर्ली वार्निंग सिस्टम यानी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की व्यापक तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ता जोखिम
जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप ग्लेशियरों के पिघलने की गति में भारी इजाफा हुआ है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पहाड़ों की ऊंचाइयों पर प्राकृतिक झीलों का आकार लगातार बड़ा होता जा रहा है। इन झीलों के चारों तरफ मलबे और पत्थरों की प्राकृतिक दीवारें होती हैं, जो अत्यधिक पानी के दबाव या किसी छोटे भूकंप के झटके से टूट सकती हैं। यदि ऐसी कोई झील फटती है, तो भारी मात्रा में पानी और मलबा अचानक नीचे की घाटियों में आ जाता है, जिससे बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। अतीत में भी इस तरह की घटनाओं ने पहाड़ी राज्यों में भारी तबाही मचाई है, जिससे सबक लेते हुए सरकार अब पूरी तरह सतर्क नजर आ रही है।
केंद्र सरकार और संबंधित आपदा प्रबंधन एजेंसियों ने इन 188 संवेदनशील झीलों की पहचान कर ली है और वहां अत्याधुनिक निगरानी तकनीक लगाने का खाका तैयार किया है। इस अर्ली वार्निंग सिस्टम के माध्यम से झीलों के जलस्तर में होने वाले किसी भी असामान्य बदलाव या खतरे की आहट का तुरंत पता लगाया जा सकेगा। जैसे ही पानी का स्तर खतरे के निशान को पार करेगा, यह प्रणाली तुरंत स्थानीय प्रशासन और पहाड़ी बस्तियों में रहने वाले लोगों को सचेत कर देगी, जिससे समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पलायन किया जा सके। इस पूरी परियोजना का मुख्य उद्देश्य संभावित जनहानि को न्यूनतम करना और किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए आपदा प्रतिक्रिया तंत्र को पहले से अधिक मजबूत बनाना है।
स्थानीय प्रशासन और विशेषज्ञों की भूमिका
इस बड़ी पहल को सफल बनाने के लिए केंद्रीय मंत्रालयों, आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच आपसी तालमेल को बढ़ाया जा रहा है। वैज्ञानिक लगातार इन झीलों की उपग्रह के जरिए निगरानी कर रहे हैं ताकि हर गतिविधि पर बारीकी से नजर रखी जा सके। स्थानीय प्रशासन को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है और संवेदनशील क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि ग्रामीण किसी भी संभावित खतरे के प्रति जागरूक रहें। आने वाले दिनों में इस परियोजना के तहत विभिन्न चरणों में इन प्रणालियों को स्थापित करने का कार्य तेजी से पूरा किया जाएगा, जिससे हिमालयी क्षेत्रों में सुरक्षा कवच को और अधिक मजबूत किया जा सके।